सुबह के 11 बज रहे थे, और बारिश की बूंदें मेरी बालकनी की रेलिंग पर थिरक रही थीं। चाय खत्म हो चुकी थी। ऑफिस की छुट्टी थी। दोस्त ऑफिस में थे। पत्नी अपनी माँ के यहाँ गई हुई थी। बस मैं था, एक उधड़ी हुई चारपाई, और वो अजीब सी बेचैनी — जिसे हम कहते हैं "कुछ तो करूँ, पर कुछ अच्छा नहीं लग रहा।"
मैं आमतौर पर जुआरी नहीं हूँ। कभी फ्री टाइम में क्रिकेट बेटिंग कर ली, कभी दोस्त के कहने पर लॉटरी टिकट कटवा लिया। कभी बड़ी जीत नहीं मिली, न कभी उम्मीद थी। पर उस दिन कुछ अलग था। मैंने सोचा, क्यों न बस देखा जाए? पुराना अकाउंट था एक कैसीनो वेबसाइट में, बिना डिपॉजिट के बना रखा था। याद आया तो मैंने अपने मोबाइल से लॉगिन किया और जैसे ही होम स्क्रीन खुली, मेरी नज़र पहले सेव किए गए लिंक पर पड़ी — और वहाँ लिखा था वावदा मोबाइल संस्करण (https://s291.com/hi/)। कभी सुना नहीं था ये नाम। पर उस फटाफट वाली दुनिया में क्लिक करना भी एक खेल है, न?
मैंने क्लिक किया।
और अंदर जाते ही मेरी आँखें चौंधिया गईं — स्लॉट्स के रंग, रूलेट का गोल्डन टेबल, लाइव डीलर हाथ हिला रहे थे जैसे मुझे पहचानते हों। पंजीकरण का झंझट नहीं था। मैंने सोचा, बस 200 रुपए डाल देता हूँ। पिछले हफ्ते एक अनजान ऑटो वाले को 300 देकर मन दुखी किया था, ये तो कम से कम खुद के लिए होगा।
डिपॉजिट हुई। मुझे मिले 100% बोनस के साथ 400 रुपए क्रेडिट। हाय राम, ये तो शुरू में ही अच्छा लगा। पर मैंने अपने आप से कहा — "दीपक, सिर्फ आनंद ले। जीता तो चाय-पकौड़े, हारा तो कहीं सिगरेट कम पी लेना।"
शुरू किया एक पुरानी थीम पर बने स्लॉट से — फल, सितारे, सात नंबर। पहले दस स्पिन में कुछ नहीं मिला। गिरता हुआ बैलेंस देख मन कर रहा था बंद कर दूँ। पर फिर गलती से एक तरफ स्क्रॉल किया और एक नया गेम दिखा — "बुक ऑफ रा" जैसा कुछ। डरते-डरते दांव 5 रुपए कर दिया।
सातवें स्पिन पर बोनस राउंड ट्रिगर हुआ।
मेरी नींद खुल गई। हाथ में फोन था और पसीना आ रहा था। तीन स्कैटर, फिर दस फ्री स्पिन। हर स्पिन में गुणांक बढ़ता जा रहा था। पहले 2x, फिर 5x, फिर 10x। मैं चारपाई से उठकर सीधा बैठ गया। पाँचवीं फ्री स्पिन में एक प्राचीन मूर्ति आई और 1200 रुपए बन गए। सातवीं स्पिन में वही मूर्ति दोबारा आई — अब मैंने देखा, 4,500 रुपए।
साँसें भारी हो गईं।
दसवीं स्पिन में कुछ नहीं आया, लेकिन तब तक मेरा बैलेंस 5,720 रुपए था। मैंने अपने गाल पर चपत मारी। सपना तो नहीं? नहीं, सपना नहीं था। मैं तुरंत विड्रॉल स्क्रीन पर गया।
और तब मुझे एहसास हुआ कि मैंने KYC पूरी नहीं कर रखी थी।
"अरे भाड़ में जाएगा पैसा," सोचकर मैंने फिर से खेलना शुरू कर दिया। पर सोचा, चलो इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगे। जब तक पता चलता, मैं उसी वावदा मोबाइल संस्करण के भीतर वेरिफिकेशन सेक्शन में अपने आधार और सेल्फी अपलोड कर चुका था। दो मिनट में मैसेज आया — "वेरीफाइड।" भारतीय कैसीनो साइट्स को अक्सर धीमा कहते हैं, पर उस दिन तो जैसे उनकी टीम ने कॉफी छोड़कर सिर्फ मेरा काम किया।
मैंने 5,000 का विड्रॉल रखा। 720 रुपए आजमाइश के लिए बचा लिए।
सोचा, अब हारूँगा तो दुख नहीं होगा। बिंगो गेम खोला। उस नंबर पर दांव लगाया जो मेरी पत्नी का जन्मदिन था — 12. और क्या देखता हूँ, दूसरी ही बार में 12 आ गया।
दिल जोरों से धड़का। 720 से 1,800 बना।
अगला दांव रखूँ या नहीं? मैंने ठंडे दिमाग से सोचा: इस बैलेंस को भी निकलवा लेता हूँ। और तुरंत विड्रॉल की।
20 मिनट बाद मेरे फ़ोन पर मैसेज आया। पहले 5,000 आए, फिर तीन मिनट बाद 1,800। कुल 6,800 रुपए।
मैंने अपने पैर बालकनी की ओर लटकाए। बारिश रुक चुकी थी। आसमान साफ था। उस पैसे से मैंने वो सब किया जो मैं मूर्खों की तरह सोचता हूँ — सोचा था नई शर्ट लूँगा, पर अंत में वो सब पत्नी के लिए जूतों, बच्चों के लिए खिलौने और घर के लिए एक अच्छी चायदानी में लगा दिया।
जब पत्नी लौटी और मैंने बताया कि "आज एक ऑनलाइन गिफ्ट मिला है," तो वो हँसी। "तू तो लॉटरी लगने वाला है, दीपक!"
नहीं, मैं लॉटरी वाला नहीं हूँ। मैं वो हूँ जिसने एक उदास छुट्टी के दिन वावदा मोबाइल संस्करण खोला, अपनी किस्मत को चाय पिलाई, और बिना लालच के खेल खत्म किया।
अब तक वो ऐप मेरे फोन में है, पर दोबारा खेला नहीं। क्योंकि कुछ कहानियाँ सिर्फ एक बार अच्छी लगती हैं — जैसे पहले प्यार का चुम्मा, जैसे वो बारिश जो रुक गई, या पहली बड़ी जीत जो कभी हारी ही नहीं जा सकती।